3 August 2026
“शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी” : शिक्षित एवं समृद्ध युवतियों की अपराध में संलिप्तता पर कृति नारी साहित्य समिति की परिचर्चा
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“शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी” : शिक्षित एवं समृद्ध युवतियों की अपराध में संलिप्तता पर कृति नारी साहित्य समिति की परिचर्चा

Sarguja express…..

अंबिकापुर। कृति नारी साहित्य समिति, अंबिकापुर द्वारा “शिक्षित और समृद्ध युवतियां अपराध में लिप्त क्यों?” विषय पर आयोजित परिचर्चा में साहित्यकारों और बुद्धिजीवी महिलाओं ने बदलते सामाजिक परिवेश, पारिवारिक संरचना और नैतिक मूल्यों के क्षरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं का मत था कि हाल के वर्षों में सामने आई कुछ घटनाओं ने समाज को आत्ममंथन के लिए विवश किया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे महिला समाज का आकलन करना उचित नहीं है।

परिचर्चा में निर्मला श्रीवास्तव ने कहा कि भौतिकवाद, तकनीक पर बढ़ती निर्भरता और नशे की प्रवृत्ति ने संवेदनशीलता को कमजोर किया है। परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर संस्कारों की पुनर्स्थापना करनी होगी। सरिता सिंह ने स्क्रीन टाइम, अकेलेपन और आभासी दुनिया के प्रभाव को युवाओं के व्यवहार में बदलाव का प्रमुख कारण बताया।

रूही गजाला ने हाल की घटनाओं को अत्यंत चिंताजनक बताते हुए शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक परवरिश की समीक्षा की आवश्यकता जताई। माधुरी जायसवाल ने मोबाइल और हिंसक-दृश्य सामग्री पर नियंत्रण की जरूरत बताते हुए कहा कि ऐसे अपराध पूरे समाज के लिए पीड़ा का कारण बन रहे हैं।

उमा वर्मा ने परिवारों में बढ़ती संवेदनहीनता, कुसंगति और अभद्र डिजिटल सामग्री को चिंता का विषय बताया। वहीं आशा उपाध्याय ने कहा कि अपराध किसी वर्ग या लिंग तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके पीछे लालच, गलत संगति, मानसिक दबाव और नैतिक मूल्यों का अभाव जैसे अनेक कारण होते हैं।

संतोषी सिंह चंदेल ‘गुड़िया’ ने साइबर अपराध, आर्थिक धोखाधड़ी और नशे जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है जब उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिकता का समावेश हो। कांति पांडे ने संयुक्त परिवारों के विघटन और माता-पिता के समयाभाव को बच्चों के संस्कारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला प्रमुख कारण बताया।

अंजू पाण्डेय ने कहा कि शिक्षा और समृद्धि तभी सार्थक हैं जब उनके साथ चरित्र, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। वहीं गीता तिवारी ने अभिभावकों से बेटियों के मित्र बनकर उनकी भावनाओं और समस्याओं को समझने की अपील की।

परिचर्चा का निष्कर्ष रहा कि शिक्षा, आर्थिक समृद्धि और आधुनिकता के साथ यदि नैतिक मूल्य, पारिवारिक संवाद और मानवीय संवेदनाएं भी समान रूप से विकसित हों, तभी स्वस्थ और जिम्मेदार समाज का निर्माण संभव है।

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