Sarguja express…..(दीपक सराठे )
मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 10 महीने के भीतर मिले 11 अज्ञात शवों की नहीं हो सकी पहचान, गंगापुर मुक्तिधाम के पास दफनाने की जगह भी पड़ी कम
अंबिकापुर। मौत वही, जिसे दुनिया देखे…। किसी की मौत के बाद जब अपनों के कंधे पर उसकी अंतिम यात्रा निकलती है, परिवार के लोग आंसुओं के बीच अंतिम विदाई देते हैं और पूरे रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार होता है, तब जिंदगी का एक अध्याय समाप्त होने के साथ उसकी पहचान और यादें अपनों के बीच रह जाती हैं। लेकिन कुछ बदनसीब ऐसे भी होते हैं, जिन्हें मौत के बाद भी अपनों का साथ नसीब नहीं होता। न कोई पहचानने वाला, न अंतिम विदाई देने वाला और न ही श्मशान तक पहुंचाने के लिए कोई अपना। उनकी जिंदगी ही नहीं, बल्कि अंतिम सफर भी बेनाम रह जाता है। अंबिकापुर में ऐसे ही 11 लोगों की कहानी सामने आई है, जिनकी मौत के बाद भी पहचान नहीं हो सकी। हालात इतने गंभीर हैं कि अब इन अज्ञात शवों को दफनाने के लिए दो गज जमीन का इंतजाम करना भी मुश्किल होता जा रहा है।
सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पिछले 10 महीनों के भीतर 11 अज्ञात लोगों की मौत हुई। इनमें सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले और अलग-अलग स्थानों पर मृत अवस्था में मिले लोग शामिल हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद इनकी पहचान नहीं हो सकी। जिले के अन्य थाना और चौकी क्षेत्रों में सामने आने वाले अज्ञात शवों को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है।
अज्ञात शव मिलने के बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी पहचान करना होती है। मृतक कौन है, कहां का रहने वाला है, उसके परिवार में कौन-कौन हैं और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए पुलिस अपने स्तर पर तमाम प्रयास करती है। शव की तस्वीरें ली जाती हैं, कपड़े और अन्य सामान सुरक्षित रखे जाते हैं, ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति अपने लापता परिजन की तलाश में पहुंचे तो उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पहचान कराई जा सके। लेकिन कई बार तमाम कोशिशों के बाद भी कोई सामने नहीं आता। ऐसी स्थिति में पुलिस को ही अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
मेडिकल कॉलेज अस्पताल पुलिस चौकी प्रभारी के अनुसार, अज्ञात शवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव नहीं होता। इसलिए नियमानुसार आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर तस्वीरों और अन्य पहचान संबंधी जानकारियों को सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद पहचान नहीं होने की स्थिति में शव के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की जाती है।
गंगापुर में दफनाने की जगह खत्म, पुराने शवों के बीच नए शवों के लिए भी संकट
अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू गंगापुर मुक्तिधाम के बगल में स्थित नाले के आसपास सामने आ रहा है। यहां लंबे समय से अज्ञात शवों को दफनाया जाता रहा है। नगर निगम के कर्मचारी इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देते हैं। लेकिन लगातार शव दफनाए जाने के कारण अब यहां जमीन की कमी होने लगी है। स्थिति यह है कि निगम के कर्मचारी जब किसी नए अज्ञात शव को दफनाने के लिए गड्ढा खोदने पहुंचते हैं तो कई बार वहां पहले से ही दूसरा शव दफन मिलता है। समय के साथ आसपास के इलाकों में मकान भी बन गए हैं। ऐसे में शव दफनाने के लिए जगह तलाशना और भी मुश्किल हो गया है। कई बार नगर निगम के कर्मचारियों को आसपास रहने वाले लोगों के विरोध का सामना भी करना पड़ता है। सवाल यह है कि जिन लोगों की मौत के बाद कोई अपना सामने नहीं आया, उनके अंतिम संस्कार के लिए आखिर व्यवस्था कहां की जाए? जिनके जीवन में अपनों का साथ नहीं था, उन्हें अब अंतिम विदाई के लिए जमीन भी मुश्किल से मिल रही है।
कोतवाली, गांधीनगर और मणिपुर में भी नहीं सुलझी पहचान की गुत्थी
अंबिकापुर के कोतवाली, गांधीनगर और मणिपुर थाना क्षेत्रों में भी समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जिनमें मृतकों की पहचान नहीं हो पाती। कुछ मामलों में मौत की परिस्थितियां संदिग्ध होने के बावजूद मृतक की पहचान नहीं मिलने से जांच के कई पहलू अधूरे रह जाते हैं। जब तक यह पता नहीं चलता कि मृतक कौन था और उसका परिवार या सामाजिक संबंध कहां था, तब तक कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं।
ग्रामीण थाना और चौकी क्षेत्रों में भी अज्ञात शव मिलने पर पुलिस आसपास के थानों से संपर्क करती है। गुमशुदगी की रिपोर्ट से शव का मिलान करने के प्रयास किए जाते हैं। इसके बावजूद कई लोग सरकारी रिकॉर्ड में हमेशा के लिए अज्ञात बनकर रह जाते हैं।
किसी घर का बेटा, पिता या भाई हो सकता है इनका शव
इस पूरे मामले का सबसे भावुक पहलू यह है कि जिन 11 लोगों को अज्ञात मानकर अंतिम विदाई दे दी गई, उनमें से कोई किसी का बेटा, पिता, भाई या पति हो सकता था। संभव है कि किसी परिवार का सदस्य आज भी लापता हो और उसके परिजन उसकी तलाश में भटक रहे हों। उन्हें शायद यह जानकारी तक न हो कि उनका अपना कहीं अज्ञात शव के रूप में अंतिम विदाई पा चुका है। ऐसे मामलों में समाज की संवेदनशीलता भी बेहद जरूरी है। सड़क किनारे घायल या मृत अवस्था में पड़े व्यक्ति को अनदेखा करने के बजाय पुलिस को सूचना देना, लापता व्यक्ति की समय पर रिपोर्ट दर्ज कराना और पहचान संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
सवाल सिर्फ 11 शवों का नहीं, अंतिम विदाई के इंतजाम का भी है
अंबिकापुर में 10 महीने के भीतर 11 अज्ञात शवों की पहचान नहीं होना अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि गंगापुर मुक्तिधाम के पास जिस स्थान पर वर्षों से अज्ञात शवों को दफनाया जा रहा है, वहां अब जगह की कमी हो रही है। आसपास मकान बन चुके हैं और स्थानीय लोगों का विरोध भी कर्मचारियों के सामने चुनौती बन रहा है। ऐसे में जिला प्रशासन और नगर निगम को अज्ञात शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए स्थायी और व्यवस्थित स्थान की व्यवस्था करने की जरूरत है।
किसी इंसान की पहचान भले ही दुनिया से मिट जाए, लेकिन उसे सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देना व्यवस्था और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। आखिर सवाल यह नहीं है कि इन 11 लोगों का कोई अपना क्यों नहीं आया, सवाल यह भी है कि जब कोई अपना नहीं है तो क्या व्यवस्था उन्हें दो गज जमीन भी नहीं दे पाएगी?


