Sarguja express……
मो.हदीस,
सीतापुर– हरे-भरे फलदार पेड़ों पर चल रहे आरे को लेकर सीतापुर क्षेत्र में एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
ताजा मामला ग्राम पंचायत पेंट का है जहां 3 अक्टूबर 2026 को, मौके पर तैयार किए गए पंचनामा में 15 नग आम के पेड़ बिना अनुमति काटे जाना दर्ज किया गया है। मौके पर सरपंच, उपसरपंच, पंच प्रतिनिधियों की मौजूदगी पटवारी द्वारा पंचनामा तैयार कर कटाई की गई लकड़ी को वन विभाग के बिट गार्ड के सुपुर्द किया गया।

मामला सिर्फ 15 पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि लम्बे समय से इस क्षेत्र में लकड़ी तस्करी का खेल चल रहा है बताया जाता है कि ऊंचे पहुंच रखने वालों रसूकदारो का संरक्षण प्राप्त बाहर से आये ये लकड़ी तस्कर किसानों से पेड़ों का सौदा कर उन्हें कटवा रहे हैं और उन्हें एक जगह जमा करने के लिए डम्पिंग यार्ड भी बनाया गया है ,जिसे ट्रकों में भरकर दूसरे राज्यों तक पहुंचाकर मोटा मुनाफा कमाया जाता हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब पेड़ काटे जा रहे थे, तब विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां थी?
कानून में साफ नियम, फिर ‘आरा राज’ कैसे?
छत्तीसगढ़ में पेड़ों की कटाई को लेकर ‘वृक्ष कटाई नियमों के अनुसार प्राकृतिक रूप से उगे पेड़ों की कटाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन, संयुक्त निरीक्षण और सक्षम अधिकारी की अनुशंसा आवश्यक है। एक खाते में प्राकृतिक रूप से उगे पेड़ों के लिए सामान्यतः प्रति एकड़ अधिकतम 4 पेड़ और एक कैलेंडर वर्ष में कुल अधिकतम 10 पेड़ों की कटाई की अनुशंसा का प्रावधान है।
वहीं कृषि के रूप में लगाए गए पंजीकृत पेड़ों के मामले में भी कटाई से एक माह पूर्व संबंधित अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) और वन परिक्षेत्र अधिकारी को पेड़ की प्रजाति, संख्या और कटाई का कारण बताते हुए सूचना देना तथा दस्तावेजी और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया निर्धारित है।
यानी नियमों की किताब में व्यवस्था इतनी साफ है कि पहले प्रक्रिया, फिर आरा चलना चाहिए। लेकिन यहां पंचनामा में ही 15 आम के पेड़ों की बिना अनुमति कटाई सामने आने का दावा है। अब सवाल यह है कि नियम किताब में ही सुरक्षित हैं या जमीन पर भी लागू होते हैं?
आम के पेड़ हैं तो और भी बड़ा सवाल
वृक्ष कटाई नियमों में आम सहित कई फलदार प्रजातियों का विशेष उल्लेख है। नियमों में आम के पेड़ को उन प्रजातियों में रखा गया है जिनकी कटाई के लिए निर्धारित परिस्थितियों और सक्षम अधिकारी की प्रक्रिया का पालन जरूरी है। सूखा या सूख रहा आम का पेड़ भी निर्धारित प्रक्रिया से ही काटा जा सकता है।
ऐसे में यदि मौके पर दर्ज 15 आम के पेड़ बिना अनुमति हरे-भरे पेड़ थे, तो जांच का दायरा केवल लकड़ी जब्ती तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
‘परमिशन’ के नाम पर पेड़ों की गिनती कौन करेगा?
ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में सीमित संख्या में पेड़ काटने की अनुमति लेकर उससे अधिक पेड़ों पर आरा चलाए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। यदि यह आरोप सही है तो सवाल बेहद सीधा है—
परमिशन में कितने पेड़ थे और मौके पर कितने काटे गए?
पेड़ों की प्रजाति और संख्या का मिलान किसने किया?
कटाई से पहले मौके का सत्यापन हुआ था या नहीं?
और यदि अनुमति ही नहीं थी तो लकड़ी तस्करों तक पेड़ पहुंचने से पहले विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ी?
वहीं प्राकृतिक रूप से उगे पेड़ों की कटाई के बाद लकड़ी के परिवहन पर छत्तीसगढ़ वनोपज (व्यापार विनियमन) अधिनियम,छत्तीसगढ़ परिवहन (वन उपज) नियम, और भारतीय वन अधिनियम, के प्रावधान भी लागू होते हैं।
पेड़ कट गए, अब जिम्मेदारी किसकी?
मौके पर पंचनामा बन गया, लकड़ी जब्त होकर बिट गार्ड के हवाले हो गई। लेकिन ग्रामीणों का सवाल इससे आगे का है—क्या अब यह पता चलेगा कि 15 आम के पेड़ किसने कटवाए, किसके कहने पर कटे और लकड़ी कहां भेजी जानी थी?
अगर मामला वास्तव में बिना अनुमति कटाई का है तो कार्रवाई केवल आरा और लकड़ी तक क्यों रुके? कटाई कराने वालों, लकड़ी खरीदने वालों और परिवहन कराने वालों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
सवाल यह है—
जब सरकारी नियम प्राकृतिक रूप से उगे पेड़ों की कटाई तक की संख्या और प्रक्रिया तय करते हैं, तो 15 आम के पेड़ बिना अनुमति जमीन पर गिरने तक जिम्मेदार निगरानी तंत्र किस ‘हरियाली’ की रखवाली कर रहा था?
अब देखना यह है कि पंचनामा कार्रवाई की शुरुआत बनता है या फिर जब्त लकड़ी के साथ मामला भी सरकारी फाइलों के किसी कोने में ‘लकड़ी’ की तरह सूखता रहेगा।

