Sarguja express…..
मो. हदीस
सीतापुर। आजादी के 80 साल बाद जब गांव-गांव तक विकास पहुंचाने और हर घर को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के दावे किए जा रहे हैं, तब सरगुजा के ग्राम पंचायत रजपुरी स्थित बिजली पहाड़ की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां रहने वाले करीब 10 से 15 पहाड़ी कोरवा परिवार आज भी प्यास बुझाने के लिए प्राकृतिक ढोढ़ी के दूषित पानी पर निर्भर हैं। वर्षों से एक अदद हैंडपंप की मांग कर रहे इन परिवारों की गुहार अब तक जिम्मेदारों के कानों तक नहीं पहुंच सकी है।
हालात ऐसे हैं कि जिस पानी को देखकर सामान्य व्यक्ति शायद पीने से पहले कई बार सोचे, उसी पानी से इन परिवारों को अपनी प्यास बुझानी पड़ रही है। बरसात में जब नदी-नाले और आसपास जमा पानी मटमैला हो जाता है, तब ढोढ़ी की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके बावजूद इन परिवारों के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं है। प्यास लगे तो इसी ढोढ़ी से पानी लाना है, पीना है और घरेलू जरूरतें भी इसी से पूरी करनी हैं।
सरकार की योजनाओं के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच बिजली पहाड़ की यह तस्वीर बड़ी खाई दिखाती है। स्वच्छ पेयजल कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है। इसके बावजूद इस बस्ती के लोगों को वर्षों की मांग के बाद एक हैंडपंप तक नहीं मिल पाना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीण बताते हैं कि वे लंबे समय से बस्ती में हैंडपंप लगाने की मांग करते आ रहे हैं। उम्मीद थी कि कभी तो उनकी समस्या पर जिम्मेदारों की नजर पड़ेगी, लेकिन साल गुजरते गए और इंतजार लंबा होता गया। नतीजा यह है कि आज भी उन्हें उसी ढोढ़ी के भरोसे जीवन गुजारना पड़ रहा है।
अब सवाल जिम्मेदारों से है कि आजादी के 80 साल बाद भी अगर किसी बस्ती के लोगों को पीने के साफ पानी के लिए वर्षों तक गुहार लगानी पड़े, तो विकास के दावों का अर्थ क्या रह जाता है? बिजली पहाड़ के पहाड़ी कोरवा परिवारों की प्यास आखिर कब शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता जगाएगी और कब इनके हिस्से में एक अदद हैंडपंप आएगा, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

विकास के दावे पहाड़ चढ़ते-चढ़ते क्यों हांफ जाते हैं?
बिजली पहाड़ के ग्रामीणों की पीड़ा सिर्फ पानी की कमी की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी है कि दूरस्थ और जनजातीय बस्तियों तक बुनियादी सुविधाएं आखिर कब पहुंचेंगी? चुनाव और योजनाओं के दौरान विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन बिजली पहाड़ के इन परिवारों का कहना है कि उनकी बस्ती तक पहुंचते-पहुंचते ये दावे दम तोड़ देते हैं। विडंबना यह है कि एक तरफ घर-घर शुद्ध पेयजल पहुंचाने की बात होती है, दूसरी तरफ पहाड़ी कोरवा परिवार ढोढ़ी का पानी पीने को मजबूर हैं। सवाल यह भी है कि जब वर्षों से केवल एक हैंडपंप की मांग पूरी नहीं हो सकी तो दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में विकास की वास्तविक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।
बरसात में और बढ़ जाती है बेबसी
ग्रामीणों की परेशानी बरसात के दिनों में और बढ़ जाती है। आसपास बहने और जमा होने वाला पानी मटमैला होने के कारण ढोढ़ी का पानी भी प्रभावित होता है। फिर भी प्यास और रोजमर्रा की जरूरतों के आगे परिवार बेबस हैं। साफ पानी उपलब्ध नहीं होने के कारण जो मिलता है, उसी का इस्तेमाल करना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
बस्ती के अंजना बाई, सुखमतिया बाई, मनियारी बाई, घुरसाय साय, बंधनु, नई हारो बाई, शनी राम, धनेश्वर राम, सोमार साय, कुंवर साय, अजय राम, संजय राम, नान साय, दीपक रकम, दिनेश राम और सीताराम सहित अन्य पहाड़ी कोरवा ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से तत्काल हैंडपंप स्थापित कर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें कोई बड़ी सुविधा नहीं चाहिए, केवल इतना चाहिए कि उनके परिवारों और बच्चों को प्यास बुझाने के लिए दूषित ढोढ़ी पर निर्भर न रहना पड़े।


