Sarguja express..
अंबिकापुर। स्वदेशी जागरण मंच एवं स्वावलंबी भारत अभियान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित प्रांतीय विचार वर्ग एवं कार्यशाला का आयोजन हुआ। इस अवसर पर प्रदेश के सभी संभागों से आए दायित्ववान कार्यकर्ता, केंद्रीय एवं क्षेत्रीय पदाधिकारी, प्रांत स्तरीय कार्यकर्ता तथा विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का पंचम सत्र मे सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज सरगुजा जिला संचालक भगवान दास बंसल, गुरु गहरा विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र लखपाले, अर्थशास्त्री एवं स्वदेशी चिंतक प्रो. अश्विनी महाजन, स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संयोजक श्री सुधीर दाते, प्रांत संयोजक एवं स्वावलंबी भारत अभियान के समन्वयक श्री जगदीश पटेल सुब्रत चाकी सहित अनेक गणमान्यजन मंचासीन रहे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में जगदीश पटेल ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कहा कि भारत को आत्मनिर्भर एवं विकसित राष्ट्र बनाने के लिए स्वदेशी चिंतन और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। उन्होंने स्वावलंबी भारत अभियान के उद्देश्यों एवं आगामी कार्ययोजनाओं पर प्रकाश डाला।इसके पश्चात क्षेत्रीय संयोजक श्री सुधीर दाते ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना, कार्यपद्धति, वैचारिक आधार तथा संगठन द्वारा देशभर में किए जा रहे विविध जनजागरण अभियानों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि स्वदेशी केवल आर्थिक अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम है।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सांसद सरगुजा चिंतामणि महाराज जिला संचालक भगवानदास बंसल कुलपति राजेन्द्र लखपाले ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा आत्मनिर्भर भारत, ‘वोकल फॉर लोकल’ एवं स्वदेशी उत्पादों के प्रोत्साहन हेतु किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी उत्पादों के उपयोग एवं स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देकर ही भारत विश्व अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय संसाधनों के सदुपयोग तथा रोजगार सृजन में स्वदेशी की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं देश के प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अश्विनी महाजन ने वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, भारत की आर्थिक संभावनाओं तथा स्वदेशी आधारित विकास मॉडल पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति, विशाल बाजार एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है।
जब हम भारत की आर्थिक और रोजगार की स्थिति के बारे में विचार करते तो हमें अपनी पिछली स्थिति देखनी होती है। भारत लगभग 10 हजार वर्षों से एक उत्तम और समृद्ध अर्थव्यवस्था के रूप में ही विश्व में विख्यात रहा है। अनेक बार
प्रोफेसर एंगस मेडिसन, जो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर थे और वर्ल्ड बैंक की स्टडी के अंतर्गत ही उन्होंने बड़ी रिपोर्ट बनाई थी, की चर्चा होती है। उन्होंने 30 से अधिक अर्थशास्त्रियों के साथ मिलकर अनेक वर्ष अध्ययन करते रहे। अपनी रिपोर्ट मिलेनियम पर्सपेक्टिव- 2000 ईयर हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड इकानोमी में स्पष्ट लिखते हैं कि शून्य ईस्वी (ए.डी.) से लेकर 1500 तक भारत विश्व उत्पाद का 33 प्रतिशत तक हिस्सा देता था । सब प्रकार के आक्रमणकारी व अंग्रेजों द्वारा हमारे अर्थ तंत्र को तोड़ने के बाद भी यह 1720 ईस्वी में 24 प्रतिशत व 1870 तक भी 12 प्रतिशत तक था और 1947 में यह 2 प्रतिशत से भी कम रह गया, जो आज 4 प्रतिशत के आसपास है।
केवल यही एक बड़ा अध्ययन नहीं है, बाद में उत्सा पटनायक (एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री), जिन्होंने कैलिफोर्निया में रहकर गहन अध्ययन के पश्चात रिपोर्ट दी। उनका कहना है कि 1757 से लेकर 1936 तक अंग्रेजों ने, जो विभिन्न प्रकार से टैक्स व अन्य तरीकों से भारत से लूट की, उसकी मात्रा 45 ट्रिलियन डॉलर तक की है। अमेरिका जो विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, वह भी अभी केवल 24
ट्रिलियन डालर की है। यानि अमरीका की वार्षिक जीडीपी का दोगुना जितनी
संपत्ति तो अंग्रेजों ने ही लूटी। कहने का अर्थ यह है कि भारत में इतनी समृद्धि रही है, इसके कारण से भारत में बेरोजगारी का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।
भारत का भविष्य यद्यपि एक नकारात्मक धारणा भी भारत के युवाओं और अर्थशास्त्रियों में
रहती है कि यदि हम डिजिटल प्रक्रिया में जाएंगे तो रोजगार के अवसर कम
होंगे। किंतु ऐसा नहीं है। यदि हम डिजिटल इकोनामी अथवा नए प्रकार के प्रोडक्ट नहीं लाएंगे, ए.आई. रोबोटिक्स पर नहीं जाएंगे, तो हम अर्थ व रोजगार के क्षेत्र में बुरी तरह से पिछड़ सकते हैं। भारत को इस मार्ग पर तेजी से जाना
चाहिए। भारत के युवाओं में यह क्षमता है। फिर भारत में जितनी तेजी से ग्रामीण क्षेत्र में ढांचागत विकास, बिजली, वाईफाई और मोबाइल नेटवर्क हो रहा है, हम उससे इस विषय में विश्व के अग्रणी हो रहे हैं। भारत का यूपीआई ट्रांजैक्शन
सिस्टम विश्व में सब जगह विश्वसनीयता प्राप्त कर रहा है। भारत में जितना
ट्रांसजेक्शन डिजिटल माध्यम से होने लगा है, उतना अमेरिका और चीन में मिलकर भी नहीं होता। गत वर्ष भारत में 720 लाख करोड़ रुपए का डिजिटल ट्रांसजेक्शन हुआ है। भारत को यदि एक ट्रिलियन डॉलर के आईटी सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट करने का लक्ष्य रखना है तो डिजिटल इंडिया जैसे अनेक कार्यक्रम हमें
प्रारंभ करने ही होंगे। भारत के युवा इस विषय में विश्व के युवाओं की अपेक्षा
अधिक कुशल भी हैं। इसे हमारी विशेषता और ताकत मानना चाहिए और शीघ्रता से डिजिटल इकोनामी की तरफ बढ़ना चाहिए। भारत के रिजर्व बैंक ने अपनी डिजिटल करेंसी मार्केट में उतार भी दी है, जोकि धीरे-धीरे प्रचलित हो रही है। कार्यक्रम का संचालन सरगुजा संभाग संयोजक राजकिशोर चौधरी ने किया तथा आभार सहसंयोजक उपेंद्र यादव ने व्यक्त किया l
कार्यक्रम में उपस्थित कार्यकर्ताओं ने स्वदेशी विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने, स्थानीय उद्यमों को प्रोत्साहित करने तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प लिया।
यह प्रांतीय विचार वर्ग एवं कार्यशाला आगामी सत्रों में स्वदेशी अर्थनीति, रोजगार सृजन, उद्यमिता विकास, स्थानीय उत्पादन, शिक्षा, कृषि एवं सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर गहन चर्चा एवं प्रशिक्षण के साथ आगे बढ़ेगी।

