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अंबिकापुर में निधन के बाद बेटे कृष्ण कुमार अग्रवाल ने लिया नेत्रदान का प्रेरक निर्णय, डॉ. अभिजीत जैन की टीम ने रात में पूरी की प्रक्रिया
अंबिकापुर। अपनों को खोने का दुख शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, लेकिन इसी दुख की घड़ी में लिया गया एक संवेदनशील फैसला किसी दूसरे के जीवन में उजाले की नई उम्मीद जगा सकता है। अंबिकापुर निवासी स्वर्गीय ओमप्रकाश अग्रवाल के निधन के बाद उनके पुत्र कृष्ण कुमार अग्रवाल और परिवारजनों ने नेत्रदान का निर्णय लेकर मानवता और परोपकार की मिसाल पेश की। परिवार की इस पहल से कॉर्निया संबंधी दृष्टिहीनता से जूझ रहे जरूरतमंद मरीजों को नई दृष्टि मिलने की उम्मीद बनी है।
25 अक्टूबर 2026 को स्वर्गीय ओमप्रकाश अग्रवाल का रात 9:45 बजे निधन हुआ। इसकी सूचना के बाद परिजनों के सहयोग और नेत्रदान दल की तत्परता से रात करीब 11:38 बजे नेत्र ऊतक प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी की गई। निधन के लगभग दो घंटे के भीतर पूरी हुई इस प्रक्रिया ने समय पर सूचना, पारिवारिक सहमति और चिकित्सकीय टीम के समन्वय की अहमियत को रेखांकित किया।
डॉ. अभिजीत जैन के नेतृत्व में टीम ने निभाई जिम्मेदारी
नेत्रदान दल के टीम लीडर डॉ. अभिजीत जैन के नेतृत्व में डॉ. अभिषेक, डॉ. कंचन, नेत्र सहायक अधिकारी एवं सहायक नेत्रदान अधिकारी रमेश घृतकर ने प्रक्रिया संपन्न कराई। प्राप्त नेत्र ऊतकों को सिम्स, बिलासपुर पहुंचाने में जयप्रकाश विश्वकर्मा ने सहयोग दिया।
इस मानवीय कार्य के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने और समन्वय बनाने में राजमाता श्रीमती देवेंद्रकुमारी सिंहदेव शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, अंबिकापुर के अधिष्ठाता डॉ. अविनाश मेश्राम, सिविल सर्जन डॉ. जे.के. रेलवानी और नोडल अधिकारी डॉ. रजत टोप्पो का भी उल्लेखनीय योगदान रहा।
मृत्यु के बाद छह घंटे के भीतर जरूरी है सूचना
नेत्रदान के लिए मृत्यु के तुरंत बाद नजदीकी आई बैंक अथवा नेत्र विभाग से संपर्क करना चाहिए। सामान्यतः मृत्यु के छह घंटे के भीतर नेत्र ऊतक प्राप्त करने की प्रक्रिया की जाती है। समय पर सूचना मिलने से दान की प्रक्रिया पूरी करने में मदद मिलती है।
यदि किसी व्यक्ति ने जीवनकाल में नेत्रदान का संकल्प नहीं लिया हो, तब भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत निकट परिजन की लिखित सहमति से नेत्रदान कराया जा सकता है। वहीं, पहले से संकल्प लेने वाले व्यक्ति के मामले में भी परिजनों की जानकारी और सहमति महत्वपूर्ण होती है।
बुजुर्ग और चश्मा पहनने वाले भी कर सकते हैं नेत्रदान
नेत्रदान को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां हैं। अधिक उम्र होना, चश्मा पहनना या मोतियाबिंद होना अपने आप में नेत्रदान की बाधा नहीं है। दान किए गए ऊतकों की जांच और गुणवत्ता के मूल्यांकन के बाद विशेषज्ञ तय करते हैं कि उनका प्रत्यारोपण के लिए उपयोग किया जा सकता है या नहीं।
नेत्रदान में आंख के सामने स्थित पारदर्शी हिस्से कॉर्निया का उपयोग प्रत्यारोपण के लिए किया जाता है। इससे कॉर्निया संबंधी दृष्टिहीनता से प्रभावित उपयुक्त मरीजों को दृष्टि मिलने की संभावना बनती है।
चिकित्सकीय दल द्वारा नेत्र ऊतक प्राप्त करने की प्रक्रिया सम्मानपूर्वक पूरी की जाती है। इससे चेहरे की सामान्य बनावट विकृत नहीं होती और आमतौर पर अंतिम संस्कार की परंपराओं में भी बाधा नहीं आती। नेत्रदान पूरी तरह स्वैच्छिक है तथा मानव नेत्रों और ऊतकों की खरीद-बिक्री प्रतिबंधित है।
नेत्रदान दल के आने तक बरतें ये सावधानियां
मृत्यु के बाद नेत्रदान का निर्णय लेने पर परिजन मृतक की पलकों को धीरे से बंद रखें। बंद पलकों पर साफ नम रुई या गॉज रखें, सिर को थोड़ा ऊंचा रखें और आंखों को सूखने से बचाने के लिए पंखा बंद कर दें। इसके बाद आई बैंक या चिकित्सकीय दल के निर्देशों का पालन करें।
एक परिवार का फैसला, समाज के लिए बड़ी प्रेरणा
स्वर्गीय ओमप्रकाश अग्रवाल के परिजनों ने दुख की घड़ी में नेत्रदान का निर्णय लेकर यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसकी आंखें किसी दूसरे के जीवन में उजाले की वजह बन सकती हैं। यह पहल समाज को नेत्रदान के प्रति जागरूक होने और इससे जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने की प्रेरणा देती है।
नागरिकों से अपील की गई है कि वे नेत्रदान की सही जानकारी प्राप्त करें, अपने परिवार के सदस्यों से इस विषय पर चर्चा करें और जरूरतमंदों को नई दृष्टि देने के इस मानवीय अभियान में आगे आएं।

