21 May 2024
यादों के झरोखे से-….कुछ जिंदगी में आपका ऐसा कमाल हो, रूखसत के बाद दुनियाँ को उसका मलाल हो … अस्त हो गया सरगुजा का दैदीप्यमान साहित्यिक सूर्य रामप्यारे रसिक…
राज्य यादें

यादों के झरोखे से-….कुछ जिंदगी में आपका ऐसा कमाल हो, रूखसत के बाद दुनियाँ को उसका मलाल हो … अस्त हो गया सरगुजा का दैदीप्यमान साहित्यिक सूर्य रामप्यारे रसिक…

दीपक सराठे

छत्तीसगढ़ प्रान्त के सुदूर सरगुजा अंचल में साहित्य का अलख जगाने वाले मूर्धन्य साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार रामप्यारे रसिक दिनांक 13 जुलाई-2023 को सावन एकादशी के दिन रात्रि 10.30 बजे इहलोक से परलोकगमन कर गये । रामप्यारे रसिक का जन्म अम्बिकापुर के ब्रम्हपारा में 16 सितम्बर 1933 को हुआ था । इनके पिता स्व.गंगा राम तथा माता श्रीमती बोदो देवी ने इन्हें बड़े दुलार से पाला । किन्तु अल्पावस्था ही इनकी जन्मदात्री माता के निधन के पश्चात् इनकी विमाता श्रीमती मंजरी देवी ने इनका लालन-पालन किया। जीवकोपार्जन के लिए पलायन के क्रम में इनके पूर्वज सर्वप्रथम बिहार प्रांत के ग्राम कोन से जिला सरगुजा के प्रतापपुर में आये थे। तत्पश्चात् रियासतकाल में अम्बिकापुर पैलेस में इनके पिता सेवादार के रूप में अपनी सेवायें देते हुए शिक्षकीय कार्य में संलग्न रहे। इनकी इकलौती बहन स्व, चम्पा देवी का विवाह प्रतापगढ़ के स्वभगलू राम से हुआ था।

इनकी प्रारंभिक शिक्षा अम्बिकापुर के गद्दी स्कूल में तथा आगे की पढ़ाई एडवर्ड हाई स्कूल वर्तमान मल्टीपरपज हायर सेकेण्डरी स्कूल से पूर्ण हुई थी । मैट्रिक पास करने के बाद आर्थिक अभाव के कारण इनकी आगे की पढ़ाई नहीं हो सकी। पिता के क्षय रोग से ग्रसित होने एवं आर्थिक तंगी के कारण पिता के इलाज एवं परिवार चलाने के लिए इन्हें सायकल रिपेयरिंग, पान की दुकान सहित कम्पाउण्डरी का काम करना पड़ा। सन् 1959 में इनके पिता के निधन के पश्चात् इन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। किन्तु अपनी प्रबल इच्छाशक्ति से इन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। इन्हें मल्टीपरपज स्कूल में लैब अटेण्डेंट की नौकरी मिली बाद इसके ग्राम बुलगा में शिक्षक की नौकरी की। अम्बिकापुर से प्रतिदिन सायकल से लगभग 50 किलोमीटर अपने कर्त्तव्य स्थल तक आने-जाने में अचानक स्वास्थ्य खराब हो जाने से आपने शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और कलेक्ट्रेट सरगुजा में लिपिकीय कार्यग्रहण किया। इस दौरान आपने स्थानांतरण पर बैकुण्ठपुर, राजपुर, भैयाथान, सूरजपुर आदि स्थानों पर अपनी सेवायें दी आपका स्थानांतरण विपरीत परिस्थितियों में जांजगीर हो जाने से आपने सन् 1967 में शासकीय सेवा का त्याग कर दिया ।
श्री रसिक जी का विवाह 18 वर्ष की आयु में ग्राम रकेली के गंवटिया स्व. देवधर राम एवं स्व. लखिया देवी की बड़ी सुपुत्री स्व.सावित्री देवी से हुआ था ।

विपन्नता में भी प्रसन्नता तथा आपसी प्रेम एवं समर्पण से भरा आपका जीवन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आप दोनों ने पांच पुत्र एवं पांच पुत्रियों से सुसज्जित संसार की रचना की। आपके पुत्रों के नाम अरूण, प्रभात, प्रदीप, प्रकाश, प्रवीण तथा पुत्रियों के नाम चन्दा, तारा, संध्या, जूली और मिली हैं। नियति के हाथों आपकी दो संताने प्रवीण और संध्या असमय संसार सागर को छोड़ कर ब्रम्ह में लीन हो गए । उनके सदमा से निकलने के कुछ सालों बाद ही आपको अपनी धर्मपत्नी के विछोह का गहरा आघात लगा जब 01 सितम्बर 2014 को स्व. सावित्री देवी भी इस संसार में आपको अकेला छोड़ कर स्वर्गलोक को चली गई । दुखों के झंझावात आपको बार-बार हिलाते रहे। लेकिन हर सुख-दुख में सम रहने की दृष्टि ने आपको जीवन्त बनाए रखा। बाल्यकाल से आप पर आपके पिता स्व.गंगा राम जी की साहित्यक लगाव का असर रहा और स्कूली शिक्षा के दौरान ही आपकी लेखनी ने साहित्य के क्षेत्र में अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया था किन्तु वास्तविक रूपों में आपकी साहित्यिक प्रतिभा शासकीय सेवा से मुक्ति के पश्चात चरम की ओर अग्रसर हुआ जब आपने स्वतंत्र लेखन के साथ सन् 1968 में सरगुजा से प्रकाशित सरगुजा संदेश नामक साप्ताहिक समाचार पत्र में साहित्य संपादक का कार्यभार संभाला। उक्त पत्र के संपादक एवं प्रकाशक सरगुजा राजपरिवार के नजदीकी स्व. रविन्द्र प्रताप सिंहजी थे। आप दोनों घनिष्ट मित्र, साहित्य और संगीत के प्रेमी भी थे । आपने अपने प्रयासों से संगीत एवं कलाप्रेमियों को जोड़ कर रामानुज कला परिषद का गठन किया जिसके माध्यम से विविध मनोरंजक एवं जनहितकारी कार्यक्रम आयोजित किए गए। परिषद् के अध्यक्ष स्वनुरूद्दीन खान और उनके साथी कलाकारों में स्व. चन्द्रभूषण मिश्र स्व.चन्दन राम स्व. राजेन्द्र गुप्त, रामचन्द्र गोस्वामी, प्रकाश वर्मा, सुदर्शन कश्यप स्व. सावित्री खन्ना, स्व.नरेन्द्र सिंह, स्व. बिरजू गुप्ता, स्व. कव्वाल मो. सईद खान, हिन्छलाल, छोटे लाल, मोहरलाल राही श्रीमती मृदुला गोस्वामी, उषा गुप्ता, वंदना दत्ता आदि प्रमुख थे। परिषद के कलाकार आपके रचित गीतों को सुरों में ढाल कर उसे जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करते थे जो आज भी स्थापित एवं नवोदति कलाकारों के द्वारा अनवरत जारी है। सन् 1976 में अम्बिकापुर में आकाशवाणी की स्थापना के साथ सरगुजिहा बोली के प्रचार-प्रसार का दायित्व निभाते हुए आपने सन् 1978 में सरगुजिहा रामायण की रचना की । इसे संगीत रूपक के रूप में आकाशवाणी द्वारा धारावाहिक के रूप में प्रसारित किया गया । अपनी बात में रसिकजी स्वयं का परिचय देते हैं-

“लेकर छाले बस पांवों में मैं चलता रहा अभावों में
बस पीड़ाओं का ही अब तक करता आया हूं मैं संचय-
बस इतना है मेरा परिचय” ।

 

रसिक जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी चलाई गद्य और पद्य में समान पकड़ रखने वाले रसिक जी की रचनायें भाव-विचार से परिपूर्ण सरल, सहज, सुबोध एवं प्रभावपूर्ण भाषा में जीवन एवं तात्कालिक परिवेश का साक्षात्कार कराती है। आपकी रचनाओं में समाज सुधार का संदेश सर्वत्र बिखरा दिखाई देता है। । आपकी प्रकाशित कृतियों में श्वेताम्बरा (भजन संग्रह), सरगुजिहा रामायण (सरगुजिहा- छत्तीसगढ़ी), पलकों में समन्दर (हिन्दी गीत). सलमा के बेटे (हिन्दी कहानियों), पूजा के फूल (भजन) हमारी धरोहर का संग्रह लोक कथायें (सरगुजिहा किस्से कहनी), दर्दों का काफिला (गज़लें), अक्षर गीत ( साक्षरता गीत) माटी के गीत, सतरंगी करौदा (सरगुजिहा गीत) बांधले पीरितिया के डोर (भोजपुरी गीत). कलाम-ए-रसिक (गीत गजल) एवं जंगली प्रजातंत्र (हास्य-व्यंग्य लघुकथायें) प्रमुख हैं। इसके अलावा आपके द्वारा सरगुजा राजपरिवार का इतिहास, कश्यप ( कहार) समाज का इतिहास कुदरगढ़ एवं सरगुजा के पुरातात्विक स्थलों के साथ महामाया मंदिर तथा अन्य मंदिरों का इतिहास भी लिखा गया है। आपकी रचनायें देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर छपती रही हैं। इसके अलावा आपके साप्ताहिक सरगुजा संदेश एवं सरगुजा समाचार में प्रकाशित स्थायी स्तंभ नगर कल्लोल, आजाद कलम, हालाते शहर सच्चाई के आईने में आदि अत्यन्त लोक प्रिय रहे हैं। नगर कल्लोल में देश, प्रदेश की समस्याओं एवं स्थानीय हालातों पर चुटीले दोहों के माध्यम से करारा कटाक्ष करने के कारण आपको सरगुजा के कबीर के रूप में याद किया जाता है । रसिक जी की साहित्यिक अवदानों को देखते हुए सन् 1987-88 में रसिक जी की रचनाओं में मानवीय संवेदना का अनुशीलन” विषय पर एम.ए. के शोधार्थी श्री संगलराम पावले ने शोध कार्य कर गुरूघासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आकाशवाणी अम्बिकापुर के एप्रूव्हड गीतकार के रूप में आपकी प्रसिद्धि सर्वव्याप्त है जहां से आपके गीतों, कहानियों, प्रहसन, नाटक, संगीत रूपकों का नियमित प्रसारण समय-समय पर होता रहा है। आपकी सरगुजिहा रचना रसिक के दोहे को छ.ग. शासन के प्राथमिक स्कूल कक्षा 5वीं) के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है ।

रसिक जी अपनी बेबाकी एवं स्वाभिमानी स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। सन् 1982 में आपकी धर्मपत्नी के कूल्हे की हड्डी टूट जाने के कारण आपको उन्हें उनकी चिकित्सा के लिए जबलपुर ले जाना पड़ा । उपचार में विलम्ब से उपस्थित होने पर सरगुजा संदेश के संपादक से किसी बात पर मतभेद उत्पन्न होने से आपने साप्ताहिक ‘सरगुजा संदेश का कार्य अविलम्ब छोड़ कर सरगुजा पैलेस से प्रबंधन में प्राप्त सरगुजा प्रिंटर्स का प्रभार संपादक महोदय को सौंप कर सन् 1983 से अपना स्वयं का प्रिंटिंग प्रेस ‘गंगा प्रिंटिंग प्रेस एवं साप्ताहिक समाचार पत्र ‘सरगुजा समाचार का संपादन एवं प्रकाशन महामाया रोड, अम्बिकापुर से प्रारंभ किया। अपने

संपादन में प्रकाशित समाचार पत्रों में रसिक जी ने नवोदित रचनाकारों को स्थान देकर उन्हें लेखन के प्रति सदैव प्रोत्साहित किया। आज भी कई श्रेष्ठ रचनाकार रसिकजी को अपना साहित्यिक गुरु के रूप में सहज स्वीकार करते हैं। उन्होंने लोगों को सरल, सहज और सुबोध रचना के लिए प्रेरित किया। उनके साहित्य का भावपक्ष अत्यन्त प्रांजल, विचारपरक और सुधारवादी दृष्टिकोण लिए हुए है। उन्होंने सिर्फ स्वान्तः सुखाय के लिए नहीं अपितु लोकमंगल की कामना से साहित्य सृजन किया । यही वजह है कि उनकी रचनायें जन-जन में व्याप्त हैं। कला पक्ष की दृष्टि से देखें तो रसिक जी की रचनायें समस्त रस, छन्द, अलंकारों से परिपूर्ण व्याकरणिक पैमाने पर कसे हुए हैं जो पढ़ते ही स्वाभाविक रूप से अपना स्वर ग्रहण कर लेते हैं। गद्य लेखन में छोटे और कसे हुए वाक्यों से अपनी बात कहने में पारंगत रसिक जी की भाषा शैली अत्यन्त प्रभावकारी है। व्यंग्यात्मक शैली में चुटीले वाक्य रचना से जहां वे पाठको को गुदगुदाते हैं वहीं सीधे मर्म को भेदने की अदभुत क्षमता भी रखते हैं। उनके गद्य संग्रह ‘जंगली प्रजातंत्र के संबंध में अपनी पाठकीय अनुभूति व्यक्त करते हुए प्रबुद्ध विचारक श्री बब्बनजी पाण्डेय ने लिखा है कि-प्रतीकों और उपमाओं से सजी हुई इस संग्रह की भाषा एवं शैली कथा सम्राट प्रेमचन्द के युग के कथाकारों की याद दिलाती है। सचमुच रसिक जी के साहित्य में मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का स्तुत्य प्रयास सर्वत्र परिलक्षित होता है। उन्होंने धार्मिक आडम्बर, जात-पांत और सामाजिक कुरीतियों का मुखर विरोध किया। समाज में व्याप्त विषमताओं पर कुठाराघात करती रसिकजी की लेखनी गरीबों, दलितों, समाज के वंचित वर्ग और राष्ट्र के उत्थान प्रति सदैव सजग रही है। कौमी एकता के पक्षधर रसिकजी सरगुजिहा रामायण में लिखते हैं-

एक रूप भगवान कर अलग-अलग है नाम…
रसिक कोई अल्ला कहे, कोई बोले राम । राम नाम बस सत्य है, है सपना संसार…जे एतना जानिस रसिक, ओकर बेड़ापार ।

रसिकजी यद्यपि मैट्रिक तक की पढ़ाई किये किन्तु उनके ज्ञान का स्तर इससे कई गुना ऊपर था विविध विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ थी। अपनी पैनी दृष्टिकोण एवं तार्किककता के साथ विषय का विश्लेषण करने में माहिर रसिक जी के आलेख समाज के पथ प्रदर्शक हैं। उनकी सधी हुई ड्राफटिंग और रायटिंग की तारीफ गुणी अधिवक्ता तक किया करते थे । उन्हें हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी, उर्दू संस्कृत आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने क्षेत्रीय बोली-भाषा सरगुजिहा, छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी में भी समान रूप से लेखन कार्य किया है।

उनकी सरगुजिहा रचनाओं में माटी के गीत, सररंगी करौदा, सरगुजिहा किस्से कहनी, सरगुजिहा रामायण तथा भोजपुरी रचना संग्रह बांध ले पीरितिया के डोर काफी लोकप्रिय है। उनके भीतर सीखने की जीजिविषा हमेशा रही है। यही वजह है कि उड़ीसा के जगन्नाथपुरी यात्रा के दौरान उन्होंने उड़िया लिपि की पुस्तक खरीद कर स्वाध्याय से उड़िया तथा पंजाब के अमृतसर यात्रा के दौरान पंजाबी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया था उन्होंने उर्दू में स्व हस्तलिखित शब्दकोष भी तैयार किया है जो नवरचनाकारों के लिए अत्यन्त उपयोगी है ।

रसिकजी का पूरा नाम रामप्यारे राम था जो साहित्यिक तख्खलुस ‘रसिक’ लिखा करते थे। उनके नाम के साथ इसी तख्खलुस ने उन्हें अपनी विशिष्ट पहचान दी है । उनकी पुस्तक कलाम-ए-रसिक से चन्द मचलते शेरों की यादगार छटा-

मुहब्बत की कहानी ही लिखा करता है बचपन तो. बड़े होकर के नफरत का फसाना हम बनाते हैं। इन बिजलियों का खौफ अब नहीं रहा रसिक, बेखौफ हो गया हूँ आशियाँ उजाड़ कर । भेजा है रब ने जब कहेगा लौट जायेंगे, औकात क्या हमारी रसिक हम गुलाम हैं । कब्रों पे शहंशाहों के जलते नहीं दीये, रोशन रसिक फकीर का रहता मज़ार है। रिश्ते भी देखते हैं रसिक अच्छे वक्त को, चिड़ियां भी छोड़ देते हैं सूखे दरख्त को । मिल्लत की बात कौन मुकम्मल करे रसिक, सारे फसादी आज सियासत के सदर हैं। इस जिंदगी की रेल का है कायदा रसिक, जिसका मकाम आया मुसाफिर उतर गया ।

इसी तरह अपने तमाम गीत, गजल, मुक्तक, कत्आ, दोहे, कुण्डलियां, नई कविता आदि के माध्यम से रसिक जी ने साहित्य का अजस्र स्रोत बहाकर लोगों को रससिक्त किया है । उनकी रचनाओं में श्रृंगार, करुण, वीर, वात्सल्य सहित समस्त रसों का समावेश तथा शब्द शक्ति अभिधा, व्यंजना, लक्षणा के साथ शब्द गुण प्रसाद माधुर्य व ओज अनायास ही देखने को मिलता है ।

 

साहित्य के साथ ही रसिक जी गहरी राजनीतिक समझ रखते थे। यही वजह है कि राजनेता भी उनकी कद्र किया करते थे। बतौर पत्रकार उन्होंने पीत पत्रकारिता का सहारा नहीं लिया तथा जनहितकारी मुद्दों को ईमानदारी और बेबाकी से उठाया । इसलिए राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, व्यापारियों से लेकर
सामान्य वर्ग तक ने रसिक जी को पर्याप्त सम्मान देकर सर आंखों पर बैठाया । श्रमजीवी पत्रकार संघ सूरजपुर तथा अम्बिकापुर के पत्रकार जगत के लोगों ने उन्हें
सफल पत्रकार के रूप याद करते हुए नारद सम्मान से सम्मानित भी किया। स्थानीय साहित्यिक- सामाजिक संगठनों द्वारा रसिक जी को समय-समय पर कई
स्फुट सम्मान प्राप्त हुए हैं। इसके साथ ही उन्हें छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा भी सम्मानित किया गया है। किन्तु एक पत्रकार और साहित्यकार के रूप में उनके
समग्र अवदानों का वास्तविक मूल्यांकन किया जाए तो रसिक जी इन सम्मानों से कही उच्च सम्मान के सहज हकदार दृष्टिगोचर होते हैं। यह वक्त ही तय करेगा
कि इस दिशा में शासन-प्रशासन और समाज कब और कैसा रूख अख्तियार करते है।

रसिक जी के सभी से मधुर संबंध थे। क्या छोटे क्या बड़े सभी के साथ सहृदयता से हंसकर मिलना एक-दूसरे की बातों को ध्यान से सुनना, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करना, पद प्रतिष्ठा के लोभ से दूर तटस्थ भाव से साहित्य साधना क्षमा तथा दयाशीलता एवं सहयोग की भावना उनके स्वाभाविक गुण थे । इसी कारण से दाम पंथियों के साथ ही वामपंथी विचारधारा के लोग भी हमेशा उनके आत्मीय रहे हैं। अम्बिकापुर में बड़े साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के सूत्रधार रहे रसिक जी के प्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा, पद्मश्री भोजपुरी गायिका श्रीमती शारदा सिन्हा, गजल गायक अहमद हुसैन मुहम्मद हुसैन, मो. खलील, कवि नीरज, शैल चतुर्वेदी, विद्याभूषण मिश्र, काका हाथरसी, गिरीश पंकज, बलदाऊ राम साहू दिलीप षड़ंगी आदि महानुभावों के साथ ही पुरातन एवं नवीन पीढ़ी के स्थानीय साहित्यकारों, संगीत कलाकारों, समाज प्रमुखों के साथ भी मधुर संबंध रहे हैं। वे आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनका विशाल रचना संसार उन्हें इस जगत में सदैव जीवन्त बनाये रखेगा। उन्हीं के शब्दों में

“फूलों की तरह ज़िन्दगी में तुम खिलो रसिक, बिखरो तो खुश्बुओं से जमीं तरबतर रहे ।।”

 

 

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