11 February 2026
दत्तक बने दिव्यांग…सरगुजा का एक ऐसा गांव जहां 264 की जनसंख्या में 21 लोग गूंगे बहरे, तीन लोग नेत्रहीन… जन्मजात दिव्यंता का प्रतिशत राष्ट्रीय आंकड़े से कहीं ज्यादा… राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पहाड़ी कोरवाओं का है यह गांव
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दत्तक बने दिव्यांग…सरगुजा का एक ऐसा गांव जहां 264 की जनसंख्या में 21 लोग गूंगे बहरे, तीन लोग नेत्रहीन… जन्मजात दिव्यंता का प्रतिशत राष्ट्रीय आंकड़े से कहीं ज्यादा… राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पहाड़ी कोरवाओं का है यह गांव

Sarguja express

(दीपक सराठे)
अंबिकापुर…सामानतः 1000 की जनसंख्या में 9 व्यक्ति अधिकतम दिव्यांग हो सकते हैं. परंतु छत्तीसगढ़ के सरगुजा का एक ऐसा गांव जहां दिव्यंगता का प्रतिशत राष्ट्रीय आंकड़े से कहीं ज्यादा है. सरगुजा का एक ऐसा गांव जहां मात्र 264 की जनसंख्या में 21 लोग जन्मजात गूंगे और बेहरे है. और तो और तीन लोग जन्मजात नेत्रहीन भी है. यह आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के लिए भी चौंकाने वाला है.हम बात कर रहे हैं सरगुजा के लुंड्रा क्षेत्र के आसनडीह गोटीडूमर राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाने वाले पहाड़ी कोरवाओं के गांव की.

इस गंभीर समस्याओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग के द्वारा वहां कई बार शिविर जरूर आयोजित किया गया परंतु
पहाड़ी कोरवा परिवार में दिव्यांग बच्चे पैदा होने के कारणों की पड़ताल की गई तो इस जनजाति की अनोखी परंपरा के बारे में पता चला. शहरों में आज लिविंग रिलेशनशिप आम बात है, लेकिन पहाड़ी कोरवा परिवार में लिविंग की परंपरा बरसों पुरानी है.यहां बच्चियां 10 से 12 की उम्र में बिना शादी किए आपसी सहमति से अपने ससुराल आ जाती है. 3 से 4 बच्चे होने के बाद उनकी विधिवत शादी होती है. इससे जच्चा और बच्चा दोनों की सेहत पर असर पड़ता है वही नाबालिक होने और पिता का नाम न मिलने से महिला और बच्चे शासन की योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं. पहाड़ी कोरबा संरक्षित जनजाति है जिसके चलते इसकी नसबंदी पर पाबंदी है. यही वजह है कि यहां एक महिला पर्याप्त पोषण और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के बिना 5 से 9 बच्चों तक को जन्म दे रही है. जागरूकता की कमी व बिना गैप के बच्चों का जन्म और जेनेटिक डिसऑर्डर यहां की आम समस्या है और इसी के चलते पहाड़ी कोरबा परिवार में जन्म लेने वाले बच्चे दिव्यंगता का अभिशाप जन्म से झेल रहे.

ऐसे भी परिवार जिसमें पांच- पांच सदस्य सुनने और बोलने में असमर्थ

राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पहाड़ी कोरवाओं के इस गांव में ऐसे परिवार भी मौजूद है जिन परिवार में पांच-पांच सदस्य सुनने और बोलने में असमर्थ हैं. यही नहीं एक ही परिवार के तीन-तीन लोग जन्म से ही देख नहीं सकते. इसके अलावा कम उम्र में मां बन जाने से कई परिवारों में अभी भी जच्चा और बच्चा कुपोषण का शिकार है. यहां ज्यादातर दिव्यांग बच्चों के पैदा होने का एक और मुख्य कारण यह भी सामने आया है कि 90 प्रतिशत बच्चे घर में ही पैदा होते हैं जिससे उनकी जो देखभाल होनी चाहिए वह समय पर नहीं हो पाती.

विकास के दावे तो कई… पर सच्चाई धरातल पर कुछ और

देश में कई ऐसी जनजातीय है जो इतनी ज्यादा पिछड़ी हुई है कि उन्हें राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है. ऐसी जनजाति को सरकार की ओर से खास देखने की बात कही जाती है और उनके जीवन स्तर में सुधार के विशेष प्रयास किए जाते हैं. छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सरकार के काफी प्रयासों के बाद भी पहाड़ी कोरवा परिवारों के जीवन स्तर में सुधार आज भी नही हो पाया है. बल्कि यह कहे की उनके अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो गया है. लाखों रुपए खर्च करने के दावों के बाद भी आज तक विकास यहां नहीं पहुंच पाया है.

स्वास्थ्य विभाग रख रहा निरंतर निगरानीडॉ गुप्ता

ईएनटी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉक्टर शैलेंद्र गुप्ता ने कहा कि इस गांव में स्वास्थ्य विभाग के द्वारा निरंतर निगरानी रखी जा रही है. कई बार यहां शिविर आयोजित कर जरूरी दावों के साथ-साथ लोगों को समझाइए भी दी जाती है. यहां रहने वाले पहाड़ी कोरवा परिवारों को शासन की योजनाओं का लाभ मिले इसके लिए भी निरंतर प्रयास किया जा रहा है. इसके बाद भी शासन की ओर से यहां और कार्य करने की जरूरत है.

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